Must Read !! यह भारत की वह कहानी है जो आप सुनना नहीं चाहते, लेकिन इसे सुनने की जरूरत है।
जब लोग मुझसे भारत के बारे में पूछते हैं, तो मैं दुविधा में पड़ जाती हूं। विचारों में विरोधाभास हो जाता है। उन घटनाओं के बारे में एक वाक्य में क्या कहूं, जिन्होंने मुझे मानसिक रोगी बना दिया।
भारत अद्भुत है, पर महिलाओं के लिए नरक है। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के इंडियन सिविलाइजेशन प्रोग्राम के वो तीन महीने मेरे लिए सुंदर ख्वाब भी हैं और बुरा सपना भी। मैं कौनसा हिस्सा पहले बताऊं?
ञ्चक्या मैं पुणे में बिताई उस पहली रात का जिक्र करूं, जब मैनें गणेश फेस्टिवल में जमकर डांस किया, या फिर वह उस किस्से को पहले सुनाऊं-जब कुछ लोग मुझे देखकर रुक गए, मेरे हर मूव को कैमरे में उतारने लगे।
ञ्चक्या मैं उन खूबसूरत साडिय़ों की बात करूं जिन्हें खरीदने के लिए मैं मोलभाव करने लगी थी, या फिर उस व्यक्ति के बारे में बताऊं जो उस दौरान जर्बदस्ती मुझसे सटकर खड़ा हो गया।
ञ्चजब लोग मुझे इंडियन सैंडल्स के लिए कॉम्पलीमेंट देते हैं तो वह व्यक्ति याद आ जाता है जो सैंडल्स खरीदने के बाद करीब ४५ मिनट तक मेरा पीछा करता रहा, जब तक मैं भीड़ में उस पर चिल्लाई नहीं।
ञ्चक्या मैं गोवा के उस खूबसूरत होटल के बारे में बताऊं जहां एक स्टाफ मेंबर ने मेरी रूममेट से दुष्कर्म की कोशिश की। ये कहानियां क्या मुझे क्रिसमस पार्टी के दौरान सुनानी चाहिए। मेरे दोस्तों की जिज्ञासाएं भारत के बारे में हैं, पर शायद वे जवाबों के लिए तैयार नहीं हैं।
एक साल पहले जब मैं भारत गई तो लगा-मैं तैयार हूं। भारतीय सभ्यता के बारे में ही पढ़ रही थी, हिन्दी बोल लेती थी। यूनिवर्सिटी के दिए निर्देशों का भी पालन कर रही थी-कि कैसे कपड़े पहनने हैं, सड़कों पर मुस्कुराना नहीं हैं। नजरें नहीं मिलानी है, इशारों का जवाब नहीं देना है। लेकिन शायद मैं फिर भी उन नजरों के लिए तैयार नहीं थी, जो मुझे तार-तार कर देना चाहती थीं। मैं चाहूं-उन्हें देखूं या न देखूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। चाहे मैं फल खरीदने जाऊं या फिर टेलर के पास, ये हर जगह मेरा पीछा करती थीं। मैं हर वक्त ढंकी हुई रहती थी, पर छिप नहीं सकती थी। लोग मुझे घूर ही लेते थे, हर वक्त तस्वीरें लेते रहते थे, मैं तीन महीने ऐसे ही रही-यात्रियों के स्वर्ग और महिलाओं के इस नरक में। मेरा पीछा होता था, जबरन छुआ जाता था और देखकर गलत हरकतें की जाती थीं। अमेरिका लौटने के बाद मेरी मानसिक स्थिति खराब हो गई। मेरे खून में जबरदस्त गुस्सा दौड़ रहा था, मैं फट पडऩा चाहती थी, रोज उठती तो मरने के बारे में ही सोचती। स्टूडेंट काउंसलर ने मुझे पर्सानैलिटी डिस्ऑर्डर का शिकार बताया। मुझे दवाएं दी जो मैंने नहीं लीं। हालत बिगड़ी तो दो दिन मानसिक रोगियों के वार्ड में रखा गया। अब मैं दवाओं पर हूं, दिमाग वहीं जमा हुआ है।
यह भारत की वह कहानी है जो आप सुनना नहीं चाहते, लेकिन इसे सुनने की जरूरत है।
-रॉसकैम (मिशेला ने इसी यूजर नेम से अपनी कहानी पोस्ट की है) मिशेला अब ट्रॉमा में है, वह यूनिवर्सिटी से मेडिकल लीव पर है
जब लोग मुझसे भारत के बारे में पूछते हैं, तो मैं दुविधा में पड़ जाती हूं। विचारों में विरोधाभास हो जाता है। उन घटनाओं के बारे में एक वाक्य में क्या कहूं, जिन्होंने मुझे मानसिक रोगी बना दिया।
भारत अद्भुत है, पर महिलाओं के लिए नरक है। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के इंडियन सिविलाइजेशन प्रोग्राम के वो तीन महीने मेरे लिए सुंदर ख्वाब भी हैं और बुरा सपना भी। मैं कौनसा हिस्सा पहले बताऊं?
ञ्चक्या मैं पुणे में बिताई उस पहली रात का जिक्र करूं, जब मैनें गणेश फेस्टिवल में जमकर डांस किया, या फिर वह उस किस्से को पहले सुनाऊं-जब कुछ लोग मुझे देखकर रुक गए, मेरे हर मूव को कैमरे में उतारने लगे।
ञ्चक्या मैं उन खूबसूरत साडिय़ों की बात करूं जिन्हें खरीदने के लिए मैं मोलभाव करने लगी थी, या फिर उस व्यक्ति के बारे में बताऊं जो उस दौरान जर्बदस्ती मुझसे सटकर खड़ा हो गया।
ञ्चजब लोग मुझे इंडियन सैंडल्स के लिए कॉम्पलीमेंट देते हैं तो वह व्यक्ति याद आ जाता है जो सैंडल्स खरीदने के बाद करीब ४५ मिनट तक मेरा पीछा करता रहा, जब तक मैं भीड़ में उस पर चिल्लाई नहीं।
ञ्चक्या मैं गोवा के उस खूबसूरत होटल के बारे में बताऊं जहां एक स्टाफ मेंबर ने मेरी रूममेट से दुष्कर्म की कोशिश की। ये कहानियां क्या मुझे क्रिसमस पार्टी के दौरान सुनानी चाहिए। मेरे दोस्तों की जिज्ञासाएं भारत के बारे में हैं, पर शायद वे जवाबों के लिए तैयार नहीं हैं।
एक साल पहले जब मैं भारत गई तो लगा-मैं तैयार हूं। भारतीय सभ्यता के बारे में ही पढ़ रही थी, हिन्दी बोल लेती थी। यूनिवर्सिटी के दिए निर्देशों का भी पालन कर रही थी-कि कैसे कपड़े पहनने हैं, सड़कों पर मुस्कुराना नहीं हैं। नजरें नहीं मिलानी है, इशारों का जवाब नहीं देना है। लेकिन शायद मैं फिर भी उन नजरों के लिए तैयार नहीं थी, जो मुझे तार-तार कर देना चाहती थीं। मैं चाहूं-उन्हें देखूं या न देखूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। चाहे मैं फल खरीदने जाऊं या फिर टेलर के पास, ये हर जगह मेरा पीछा करती थीं। मैं हर वक्त ढंकी हुई रहती थी, पर छिप नहीं सकती थी। लोग मुझे घूर ही लेते थे, हर वक्त तस्वीरें लेते रहते थे, मैं तीन महीने ऐसे ही रही-यात्रियों के स्वर्ग और महिलाओं के इस नरक में। मेरा पीछा होता था, जबरन छुआ जाता था और देखकर गलत हरकतें की जाती थीं। अमेरिका लौटने के बाद मेरी मानसिक स्थिति खराब हो गई। मेरे खून में जबरदस्त गुस्सा दौड़ रहा था, मैं फट पडऩा चाहती थी, रोज उठती तो मरने के बारे में ही सोचती। स्टूडेंट काउंसलर ने मुझे पर्सानैलिटी डिस्ऑर्डर का शिकार बताया। मुझे दवाएं दी जो मैंने नहीं लीं। हालत बिगड़ी तो दो दिन मानसिक रोगियों के वार्ड में रखा गया। अब मैं दवाओं पर हूं, दिमाग वहीं जमा हुआ है।
यह भारत की वह कहानी है जो आप सुनना नहीं चाहते, लेकिन इसे सुनने की जरूरत है।
-रॉसकैम (मिशेला ने इसी यूजर नेम से अपनी कहानी पोस्ट की है) मिशेला अब ट्रॉमा में है, वह यूनिवर्सिटी से मेडिकल लीव पर है